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श्लोक 13.129.37  |
परस्परविरुद्धानां प्रियं नूनं चिकीर्षसि।
सुहृदामुपरोधेन तेनासि हरिण: कृश:॥ ३७॥ |
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| अनुवाद |
| तुम अपने परस्पर विरोधी मित्रों को रोककर उन्हें प्रसन्न करना चाहते हो; और इसी चिंता के कारण तुम दरिद्र और दुर्बल हो गए हो ॥37॥ |
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| By stopping your friends who are at odds with each other you certainly want to please them; and because of this worry you have become poor and weak. ॥ 37॥ |
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