श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 129: नारदका पुण्डरीकको भगवान‍् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  13.129.37 
परस्परविरुद्धानां प्रियं नूनं चिकीर्षसि।
सुहृदामुपरोधेन तेनासि हरिण: कृश:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
तुम अपने परस्पर विरोधी मित्रों को रोककर उन्हें प्रसन्न करना चाहते हो; और इसी चिंता के कारण तुम दरिद्र और दुर्बल हो गए हो ॥37॥
 
By stopping your friends who are at odds with each other you certainly want to please them; and because of this worry you have become poor and weak. ॥ 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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