श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 129: नारदका पुण्डरीकको भगवान‍् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  13.129.35 
दत्तानकुशलैरर्थान् मनीषी संजिजीविषु:।
प्राप्य वर्तयसे नूनं तेनासि हरिण: कृश:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि तुम ज्ञानी हो, फिर भी अज्ञानी लोगों का दिया हुआ धन लेकर उसी से अपना निर्वाह करते हो; इसलिए तुम मंदबुद्धि और दुर्बल हो ॥ 35॥
 
Though you are a wise man, you take the money given by ignorant people and live on it only for the sake of your livelihood; hence you are dull and weak. ॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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