श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 129: नारदका पुण्डरीकको भगवान‍् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  13.129.32 
साधून् गृहस्थान् दृष्ट्वा च तथा साधून् वनेचरान्।
मुक्तांश्चावसथे सक्तांस्तेनासि हरिण: कृश:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
तू विरक्त महात्माओं को गृहस्थ, दुष्टों को वनवासी तथा मठ-मंदिरों में आसक्त तपस्वियों को देखता है; इसीलिए तू श्वेत और दुर्बल होता जा रहा है ॥32॥
 
You see detached saints as householders, wicked people as forest dwellers and ascetics attached to monasteries and temples; That's why you are becoming white and weak. 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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