श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 129: नारदका पुण्डरीकको भगवान‍् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  13.129.27 
अन्तर्गतमभिप्रायं नूनं नेच्छसि लज्जया।
विवेक्तुं प्राप्तिशैथिल्यात् तेनासि हरिण: कृश:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
तुम स्पष्टतः शर्मीले हो और अपने मन की बात किसी को बताना नहीं चाहते, क्योंकि तुम्हें अपनी अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति में संदेह है। इसीलिए चिंता के कारण तुम्हारा शरीर पीला और मुरझाया हुआ हो रहा है ॥27॥
 
You are obviously shy and do not want to reveal your inner intentions to anyone because you have doubts about the attainment of your desired object. That is why you are becoming pale and shriveled up due to worry. ॥27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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