श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 129: नारदका पुण्डरीकको भगवान‍् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  13.129.25 
नूनमासंजयित्वा त्वां कृत्ये कस्मिंश्चिदीप्सिते।
कश्चिदर्थयते नित्यं तेनासि हरिण: कृश:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
निश्चय ही मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार किसी को इच्छित कार्य में लगाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति का प्रयत्न करता है; इसी कारण तुम श्वेत (पीले) रंग के और दुबले-पतले होते जा रहे हो।
 
Certainly a man always tries to fulfil his selfish motives by employing someone in a desired task according to his own will; that is why you are becoming white (yellow) in complexion and thin. 25.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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