श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 129: नारदका पुण्डरीकको भगवान‍् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  13.129.15 
क्लिश्यमानान् विमार्गेषु कामक्रोधावृतात्मन:।
मन्ये त्वं ध्यायसि जनांस्तेनासि हरिण: कृश:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जिनका मन काम और क्रोध से पीड़ित है, जो कुमार्ग पर चलकर दुःख भोग रहे हैं। कदाचित् तुम ऐसे लोगों के लिए सदैव चिंतित रहते हो; इसीलिए तुम दुर्बल और श्वेत (पीले) होते जा रहे हो॥15॥
 
Those whose mind is afflicted by lust and anger, and who are following the wrong path and are suffering. Perhaps you are always worried about such people; that is why you are becoming weak and turning white (pale). ॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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