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mahabharat 13.129.10: हे रात्रिचर! तेरे मित्र तेरे आदर में रहते हुए भी अपने स्वभावदोषों के कारण तुझसे विमुख हो जाते हैं; इसी कारण तू चिन्ता के कारण दुबला-पतला होता जा रहा है॥10॥   |   mahabharat अध्याय 13.129: नारदका पुण्डरीकको भगवान‍् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 129: नारदका पुण्डरीकको भगवान‍् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  13.129.10 
नूनं मित्राणि ते रक्ष: साधूपचरितान्यपि।
स्वदोषादपरज्यन्ते तेनासि हरिण: कृश:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे रात्रिचर! तेरे मित्र तेरे आदर में रहते हुए भी अपने स्वभावदोषों के कारण तुझसे विमुख हो जाते हैं; इसी कारण तू चिन्ता के कारण दुबला-पतला होता जा रहा है॥10॥
 
O night-walker! Your friends, in spite of being well-respected by you, turn away from you due to their personality defects; that is why you are becoming thin and pale due to worry.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)