श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 128: शाण्डिली और सुमनाका संवाद—पतिव्रता स्त्रियोंके कर्तव्यका वर्णन  »  श्लोक d1-d4h
 
 
श्लोक  13.128.d1-d4h 
(अग्निसंरक्षणपरा गृहशुद्धिं च कारये।
कुमारान् पालये नित्यं कुमारीं परिशिक्षये॥
आत्मप्रियाणि हित्वापि गर्भसंरक्षणे रता।
बालानां वर्जये नित्यं शापं कोपं प्रतापनम्॥
अविक्षिप्तानि धान्यानि नान्नविक्षेपणं गृहे।
रत्नवत् स्पृहये गेहे गाव: सयवसोदका:॥
समुद्‍गम्य च शुद्धाहं भिक्षां दद्यां द्विजातिषु।)
 
 
अनुवाद
मैं अग्निहोत्र की रक्षा करती थी और घर को लीप-पोतकर स्वच्छ रखती थी। मैं प्रतिदिन बालकों की देखभाल करती थी और कन्याओं को नारीत्व की शिक्षा देती थी। अपनी प्रिय खाद्य-सामग्री का त्याग करके भी मैं गर्भ की रक्षा में सदैव तत्पर रहती थी। मैंने बालकों को शाप देना, उन पर क्रोध करना, उन्हें कष्ट देना आदि सदा के लिए त्याग दिया था। मेरे घर में कभी अन्न नहीं गिरता था। कोई अन्न बिखरता नहीं था। मैं अपने घर की गायों को घास-भूसा खिलाकर, पानी पिलाकर तृप्त करती थी और उन्हें रत्नों के समान सुरक्षित रखने की कामना करती थी तथा पवित्र अवस्था में आगे बढ़कर ब्राह्मणों को दान देती थी।
 
‘I used to protect the Agnihotra and keep the house clean by whitewashing it. I used to take care of the children daily and teach the girls about womanhood. Even after giving up the food items that I liked, I used to remain always engaged in protecting the womb. I had given up cursing the children, getting angry at them or torturing them, etc. forever. Grains were never spilled in my house. No grain was scattered. I used to satisfy the cows in my house by feeding them grass and straw, giving them water and I wished to keep them safe like gems and in a pure state, I used to go ahead and give alms to the Brahmins.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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