यश्चेदं पाण्डवाख्यानं पठेत् पर्वणि पर्वणि।
स देवलोकं सम्प्राप्य नन्दने स सुखी वसेत्॥ २२॥
अनुवाद
पाण्डुनन्दन! जो प्रत्येक पर्व के दिन इस कथा का पाठ करता है, वह देवताओं के लोक में पहुँचता है और नंदनवन में सुखपूर्वक निवास करता है॥22॥
Pandunandan! One who recites this story on every festival day, reaches the world of gods and resides happily in Nandanvan. 22॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शाण्डिलीसुमनासंवादे त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शाण्डिली और सुमनाका संवादविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२३॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २५ १/२ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥