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श्लोक 13.128.22  |
यश्चेदं पाण्डवाख्यानं पठेत् पर्वणि पर्वणि।
स देवलोकं सम्प्राप्य नन्दने स सुखी वसेत्॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| पाण्डुनन्दन! जो प्रत्येक पर्व के दिन इस कथा का पाठ करता है, वह देवताओं के लोक में पहुँचता है और नंदनवन में सुखपूर्वक निवास करता है॥22॥ |
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| Pandunandan! One who recites this story on every festival day, reaches the world of gods and resides happily in Nandanvan. 22॥ |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शाण्डिलीसुमनासंवादे त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शाण्डिली और सुमनाका संवादविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२३॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २५ १/२ श्लोक हैं) |
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