श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 128: शाण्डिली और सुमनाका संवाद—पतिव्रता स्त्रियोंके कर्तव्यका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.128.17 
अञ्जनं रोचनां चैव स्नानं माल्यानुलेपनम्।
प्रसाधनं च निष्क्रान्ते नाभिनन्दामि भर्तरि॥ १७॥
 
 
अनुवाद
स्वामी के चले जाने के बाद मुझे आँखों में रंग लगाना, माथे पर स्वर्ण का टीका लगाना, तेल से स्नान करना, फूलों की माला पहनना, शरीर पर इत्र लगाना और श्रृंगार करना अच्छा नहीं लगा॥17॥
 
‘After Swami went out, I did not like to apply eyeliner to my eyes, put a mark of golden powder on my forehead, take a bath using oil, wear garlands of flowers, apply perfume on my body and adorn myself.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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