श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 127: व्यास-मैत्रेय-संवाद—तपकी प्रशंसा तथा गृहस्थके उत्तम कर्तव्यका निर्देश  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  13.127.3-4 
यत् ते भृशतरं दानाद् वर्तयिष्यामि तच्छृणु॥ ३॥
यानीहागमशास्त्राणि याश्च काश्चित् प्रवृत्तय:।
तानि वेदं पुरस्कृत्य प्रवृत्तानि यथाक्रमम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
अतः अब मैं तुम्हें दान से भी श्रेष्ठ धर्म का वर्णन करूँगा। सुनो। इस संसार में जितने भी शास्त्र और प्रवृत्तियाँ हैं, वे सब वेदों को ध्यान में रखकर ही क्रमशः उत्पन्न हुई हैं।॥ 3-4॥
 
‘So, now I shall describe to you a Dharma which is even better than charity. Listen. All the scriptures and all the tendencies in this world have gradually come into existence keeping the Vedas in mind.॥ 3-4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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