श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 127: व्यास-मैत्रेय-संवाद—तपकी प्रशंसा तथा गृहस्थके उत्तम कर्तव्यका निर्देश  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  13.127.20 
तं प्रणम्याथ मैत्रेय: कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्।
स्वस्ति प्राप्नोतु भगवानित्युवाच कृताञ्जलि:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
तब मैत्रेय जी ने व्यास जी को प्रणाम करके उनकी परिक्रमा की और हाथ जोड़कर कहा - 'प्रभो! आप सद्गति को प्राप्त हों।'
 
Then Maitreya ji bowed to Vyasa ji and circumambulated him and with folded hands said - 'Lord! May you attain good fortune.'
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मैत्रेयभिक्षायां द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२२॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मैत्रेयकी भिक्षाविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२२॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर २४ श्लोक हैं)
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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