श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 127: व्यास-मैत्रेय-संवाद—तपकी प्रशंसा तथा गृहस्थके उत्तम कर्तव्यका निर्देश  »  श्लोक 2-3h
 
 
श्लोक  13.127.2-3h 
लोको ह्यार्यगुणानेव भूयिष्ठं तु प्रशंसति।
रूपमानवयोमानश्रीमानाश्चाप्यसंशयम्॥ २॥
दिष्ट्या नाभिभवन्ति त्वां दैवस्तेऽयमनुग्रह:।
 
 
अनुवाद
संसार के लोग सद्गुणी पुरुष की प्रशंसा करते हैं। यह सौभाग्य है कि रूप, आयु और धन का अभिमान तुम्हें प्रभावित नहीं करता। यह देवताओं की तुम पर बड़ी कृपा है। इसमें कोई संदेह नहीं है॥ 2 1/2॥
 
‘People of the world praise a man with good qualities. It is fortunate that the pride of beauty, age and wealth does not affect you. This is a great blessing of the gods on you. There is no doubt about this.॥ 2 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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