श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 127: व्यास-मैत्रेय-संवाद—तपकी प्रशंसा तथा गृहस्थके उत्तम कर्तव्यका निर्देश  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  13.127.19 
स्वस्ति प्राप्नुहि मैत्रेय गृहान् साधु व्रजाम्यहम्।
एतन्मनसि कर्तव्यं श्रेय एवं भविष्यति॥ १९॥
 
 
अनुवाद
मैत्रेय! तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं सावधानी से अपने आश्रम को जा रहा हूँ। मैंने जो कुछ कहा है, उसे स्मरण रखना; वह तुम्हारे लिए कल्याणकारी होगा।॥19॥
 
‘Maitreya! May you be blessed. Now I am going to my hermitage with caution. Remember what I have told you; it will be good for you.’॥19॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas