श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 127: व्यास-मैत्रेय-संवाद—तपकी प्रशंसा तथा गृहस्थके उत्तम कर्तव्यका निर्देश  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  13.127.1 
भीष्म उवाच
एवमुक्त: स भगवान‍् मैत्रेयं प्रत्यभाषत।
दिष्ट्यैवं त्वं विजानासि दिष्ट्या ते बुद्धिरीदृशी॥ १॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं- युधिष्ठिर! मैत्रेयजी के ऐसा कहने पर भगवान वेदव्यासजी ने उनसे कहा- 'ब्रह्मन्! तुम बड़े भाग्यशाली हो कि तुम्हें ऐसी बातों का ज्ञान है। यह सौभाग्य ही है कि तुम्हें ऐसी बुद्धि प्राप्त हुई है।॥1॥
 
Bhishma says- Yudhishthira! When Maitreya said this, Lord Ved Vyas said to him- 'Brahman! You are very fortunate that you have knowledge of such things. It is by good fortune that you have got such wisdom.॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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