श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 126: व्यास-मैत्रेय-संवाद—विद्वान् एवं सदाचारी ब्राह्मणको अन्नदानकी प्रशंसा  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  13.126.4 
मैत्रेय उवाच
निर्दोषं निर्मलं चैवं वचनं दानसंहितम्।
विद्यातपोभ्यां हि भवान् भावितात्मा न संशय:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
मैत्रेयजी बोले - मुनि! आपने दान के विषय में जो बातें कही हैं, वे दोषरहित और शुद्ध हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि आपने ज्ञान और तप द्वारा अपने अन्तःकरण को अत्यंत शुद्ध बना लिया है।॥4॥
 
Maitreya said - Muni! The things you have told about charity are flawless and pure. There is no doubt that you have made your inner being extremely pure through knowledge and penance. ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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