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श्लोक 13.126.17  |
तैर्हि सद्भि: कृत: पन्थास्तेन यातो न मुह्यते।
ते हि स्वर्गस्य नेतारो यज्ञवाहा: सनातना:॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| ऐसे महात्माओं के बनाए हुए मार्ग पर चलने वाला मनुष्य कभी मोह में नहीं पड़ता, क्योंकि वे मनुष्यों को स्वर्ग ले जाते हैं और सनातन यज्ञ के कर्ता हैं ॥17॥ |
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| The one who walks on the path created by such saints is never deluded, for they take men to heaven and are the performers of the eternal sacrifice. ॥17॥ |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मैत्रेयभिक्षायामेकविंशत्यधिक शततमोऽध्याय:॥ १२१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मैत्रेयकी भिक्षाविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२१॥
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