श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 124: कीड़ेका ब्राह्मणयोनिमें जन्म लेकर ब्रह्मलोकमें जाकर सनातनब्रह्मको प्राप्त करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  13.124.15 
तेऽपि यस्मात् प्रभावेण हता: क्षत्रियपुंगवा:।
सम्प्राप्तास्ते गतिं पुण्यां तस्मान्मा शोच पुत्रक॥ १५॥
 
 
अनुवाद
बेटा! (उस कीड़े ने युद्ध करके क्षत्रिय योनि में प्राण त्याग दिए थे, इसलिए वह उत्तम गति को प्राप्त हुआ।) इसी प्रकार जो श्रेष्ठ क्षत्रिय इस युद्धभूमि में पराक्रम दिखाकर मारे गए, वे भी उत्तम गति को प्राप्त हुए हैं। इसलिए तू उनके लिए शोक मत कर॥ 15॥
 
Son! (That insect had sacrificed its life in the form of a Kshatriya by fighting, therefore it attained a good state.) Similarly, the prominent Kshatriyas who displayed their prowess and were killed in this battlefield have also attained a virtuous state. Therefore, do not grieve for them.॥ 15॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि कीटोपाख्याने एकोनविंशत्यधिक शततमोऽध्याय:॥ ११९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें कीड़ेका उपाख्यानविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११९॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)