श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 124: कीड़ेका ब्राह्मणयोनिमें जन्म लेकर ब्रह्मलोकमें जाकर सनातनब्रह्मको प्राप्त करना  »  श्लोक 11-12h
 
 
श्लोक  13.124.11-12h 
कीट उवाच
सुखात् सुखतरं प्राप्तो भगवंस्त्वत्कृते ह्यहम्॥ ११॥
धर्ममूलां श्रियं प्राप्य पाप्मा नष्ट इहाद्य मे।
 
 
अनुवाद
पहले वाले कीड़े ने कहा - प्रभु ! आपके प्रयत्नों से मुझे अधिकाधिक सुख प्राप्त हो रहे हैं। अब इस जन्म में धर्म-धन प्राप्त होने से मेरे सारे पाप नष्ट हो गए हैं । 11 1/2॥
 
The former insect said – Lord! Due to your efforts, I have been achieving more and more happiness. Now by getting religious wealth in this birth, all my sins have been destroyed. 11 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)