श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 123: कीड़ेका क्रमश: क्षत्रिययोनिमें जन्म लेकर व्यासजीका दर्शन करना और व्यासजीका उसे ब्राह्मण होने तथा स्वर्गसुख और अक्षय सुखकी प्राप्ति होनेका वरदान देना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  13.123.7 
गुणभूतानि भूतानि तत्र त्वमुपभोक्ष्यसे।
तत्र तेऽहं विनेष्यामि ब्रह्म त्वं यत्र वैष्यसि॥ ७॥
 
 
अनुवाद
वहाँ तुम आसक्तिरहित होकर, पंचभूतों का रूप समझकर, विषयों का भोग करोगे। उस समय मैं तुम्हारे पास आकर तुम्हें ब्रह्मज्ञान सिखाऊँगा और जिस लोक में तुम जाना चाहोगे, वहाँ ले जाऊँगा। ॥7॥
 
There you will enjoy the objects of life without any attachment, considering them to be the transformation of the five elements. At that time I will come to you and teach you the knowledge of Brahman and take you to the world you wish to go to. ॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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