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श्लोक 13.123.24  |
तिर्यग्योन्या: शूद्रतामभ्युपैति
शूद्रो वैश्यं क्षत्रियत्वं च वैश्य:।
वृत्तश्लाघी क्षत्रियो ब्राह्मणत्वं
स्वर्गं पुण्यं ब्राह्मण: साधुवृत्त:॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| तिर्यग-योनि में पड़ा हुआ जीव जब ऊपर की ओर उठता है, तब वहाँ से सर्वप्रथम शूद्र-भाव को प्राप्त होता है। शूद्र वैश्ययोनि को, वैश्य क्षत्रियों को और सदाचार से सुशोभित क्षत्रियों को यह भाव प्राप्त होता है। तत्पश्चात् पुण्यात्मा ब्राह्मण पुण्यस्वर्ग को प्राप्त होता है। 24॥ |
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| When the living being lying in the Tiryag-Yoni rises upwards, then from there first attains the Shudra-bhava. It is attained by Shudra Vaishyayonikas, Vaishyas by Kshatriyas and Kshatriyas adorned with good conduct by Brahmins. Then the virtuous Brahmin goes to the virtuous heaven. 24॥ |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि कीटोपाख्याने अष्टादशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें कीड़ेका उपाख्यानविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११८॥
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