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mahabharat 13.123.20: स्वार्थी, क्रूर और अत्याचारी शूद्र बनकर तुमने पूर्वजन्म में जो पाप संचित किए थे, वे सदा के लिए नष्ट नहीं हुए हैं। ॥20॥   |   mahabharat अध्याय 13.123: कीड़ेका क्रमश: क्षत्रिययोनिमें जन्म लेकर व्यासजीका दर्शन करना और व्यासजीका उसे ब्राह्मण होने तथा स्वर्गसुख और अक्षय सुखकी प्राप्ति होनेका वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 123: कीड़ेका क्रमश: क्षत्रिययोनिमें जन्म लेकर व्यासजीका दर्शन करना और व्यासजीका उसे ब्राह्मण होने तथा स्वर्गसुख और अक्षय सुखकी प्राप्ति होनेका वरदान देना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  13.123.20 
न तु नाशोऽस्ति पापस्य यस्त्वयोपचित: पुरा।
शूद्रेणार्थप्रधानेन नृशंसेनाततायिना॥ २०॥
 
 
अनुवाद
स्वार्थी, क्रूर और अत्याचारी शूद्र बनकर तुमने पूर्वजन्म में जो पाप संचित किए थे, वे सदा के लिए नष्ट नहीं हुए हैं। ॥20॥
 
The sins you accumulated in your previous life by being a selfish, cruel and tyrannical Shudra have not been destroyed forever. ॥20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)