Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.123.19: व्यासजी बोले - राजन ! आज तुमने अपनी वाणी से मेरी अच्छी प्रशंसा की है। अभी तक तुम्हें अपने कीट-स्वभाव अर्थात् मांसभक्षण की घृणित स्मृति बनी हुई है ॥19॥   |   mahabharat अध्याय 13.123: कीड़ेका क्रमश: क्षत्रिययोनिमें जन्म लेकर व्यासजीका दर्शन करना और व्यासजीका उसे ब्राह्मण होने तथा स्वर्गसुख और अक्षय सुखकी प्राप्ति होनेका वरदान देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 123: कीड़ेका क्रमश: क्षत्रिययोनिमें जन्म लेकर व्यासजीका दर्शन करना और व्यासजीका उसे ब्राह्मण होने तथा स्वर्गसुख और अक्षय सुखकी प्राप्ति होनेका वरदान देना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  13.123.19 
व्यास उवाच
अर्चितोऽहं त्वया राजन् वाग्भिरद्य यदृच्छया।
अद्य ते कीटतां प्राप्य स्मृतिर्जाता जुगुप्सिता॥ १९॥
 
 
अनुवाद
व्यासजी बोले - राजन ! आज तुमने अपनी वाणी से मेरी अच्छी प्रशंसा की है। अभी तक तुम्हें अपने कीट-स्वभाव अर्थात् मांसभक्षण की घृणित स्मृति बनी हुई है ॥19॥
 
Vyasji said – King! Today you have praised me well with your voice. Till now you still have the disgusting memory of your insect-like nature, i.e. the habit of eating meat. 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)