श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 123: कीड़ेका क्रमश: क्षत्रिययोनिमें जन्म लेकर व्यासजीका दर्शन करना और व्यासजीका उसे ब्राह्मण होने तथा स्वर्गसुख और अक्षय सुखकी प्राप्ति होनेका वरदान देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.123.17 
प्रसादात् सत्यसंधस्य भवतोऽमिततेजस:।
यदहं कीटतां प्राप्य सम्प्राप्तो राजपुत्रताम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
आप सत्यवादी और अत्यन्त तेजस्वी हैं; आपकी कृपा से ही आज मैं कीट से राजकुमार बन गया हूँ ॥17॥
 
You are truthful and of immense brilliance; it is because of your grace that today I have been transformed from an insect into a prince. ॥17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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