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mahabharat 13.122.16: हे कीट! तू शब्द, स्पर्श, रस, गंध तथा अनेक छोटे-बड़े सुखों का अनुभव नहीं करता। अतः तेरे लिए मर जाना ही अच्छा है।॥16॥   |   mahabharat अध्याय 13.122: शुभ कर्मसे एक कीडे़को पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 122: शुभ कर्मसे एक कीडे़को पूर्व-जन्मकी स्मृति होना और कीट-योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  13.122.16 
शब्दं स्पर्शं रसं गन्धं भोगांश्चोच्चावचान् बहून्।
नाभिजानासि कीट त्वं श्रेयो मरणमेव ते॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे कीट! तू शब्द, स्पर्श, रस, गंध तथा अनेक छोटे-बड़े सुखों का अनुभव नहीं करता। अतः तेरे लिए मर जाना ही अच्छा है।॥16॥
 
‘Insect! You do not experience sound, touch, taste, smell and many small and big pleasures. Therefore it is better for you to die.'॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)