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mahabharat 13.120.43: जो शरीर-लोलुप, मूर्ख और नीच मनुष्य यज्ञ, याज्ञ आदि वैदिक कर्मों के नाम पर प्राणियों की हिंसा करता है, वह नरक में बंधता है ॥43॥   |   mahabharat अध्याय 13.120: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 120: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  13.120.43 
इज्यायज्ञश्रुतिकृतैर्यो मार्गैरबुधोऽधम:।
हन्याज्जन्तून् मांसगृध्नु: स वै नरकभाङ्नर:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
जो शरीर-लोलुप, मूर्ख और नीच मनुष्य यज्ञ, याज्ञ आदि वैदिक कर्मों के नाम पर प्राणियों की हिंसा करता है, वह नरक में बंधता है ॥43॥
 
The flesh-loving, foolish and wretched person who commits violence against living beings in the name of Vedic rituals like Yagya, Yagya etc., is bound to hell. 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)