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mahabharat 13.120.34: जो दूसरों का मांस खाकर अपना मांस बढ़ाना चाहता है, वह जहाँ भी जन्म लेता है, वहाँ शान्ति से नहीं रह सकता ॥34॥   |   mahabharat अध्याय 13.120: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 120: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  13.120.34 
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति।
उद्विग्नवासो वसति यत्र यत्राभिजायते॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जो दूसरों का मांस खाकर अपना मांस बढ़ाना चाहता है, वह जहाँ भी जन्म लेता है, वहाँ शान्ति से नहीं रह सकता ॥34॥
 
He who seeks to increase his flesh by consuming the flesh of others cannot live in peace wherever he is born. ॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)