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mahabharat 13.120.32: जैसे यहाँ लोग हिंसक पशुओं का शिकार करते हैं और उन पशुओं को अपना कोई रक्षक नहीं मिलता, वैसे ही प्राणियों की हिंसा करने वाले क्रूर मनुष्य अगले जन्म में समस्त प्राणियों के लिए कष्ट का कारण बनते हैं और अपना कोई रक्षक नहीं पाते ॥ 32॥   |   mahabharat अध्याय 13.120: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 120: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  13.120.32 
त्रातारं नाधिगच्छन्ति रौद्रा: प्राणिविहिंसका:।
उद्वेजनीया भूतानां यथा व्यालमृगास्तथा॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
जैसे यहाँ लोग हिंसक पशुओं का शिकार करते हैं और उन पशुओं को अपना कोई रक्षक नहीं मिलता, वैसे ही प्राणियों की हिंसा करने वाले क्रूर मनुष्य अगले जन्म में समस्त प्राणियों के लिए कष्ट का कारण बनते हैं और अपना कोई रक्षक नहीं पाते ॥ 32॥
 
Just as people hunt ferocious animals here and those animals do not find any protector for themselves, similarly, ferocious human beings who commit violence against creatures become the object of distress for all creatures in their next birth and do not find any protector for themselves. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)