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mahabharat 13.120.26-27: महाराज! जो मनुष्य मांस नहीं खाता, वह भयंकर स्थानों, भयंकर दुर्गों और घने जंगलों में, दिन-रात, चौराहों पर और सभाओं में दूसरों से नहीं डरता। और यदि उस पर शस्त्र भी उठाये जाएँ, अथवा उसे जंगली पशुओं और साँपों का भय भी हो, तो भी वह दूसरों से नहीं डरता। ॥26-27॥   |   mahabharat अध्याय 13.120: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 120: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  13.120.26-27 
कान्तारेष्वथ घोरेषु दुर्गेषु गहनेषु च।
रात्रावहनि संध्यासु चत्वरेषु सभासु च॥ २६॥
उद्यतेषु च शस्त्रेषु मृगव्यालभयेषु च।
अमांसभक्षणे राजन् भयमन्यैर्न गच्छति॥ २७॥
 
 
अनुवाद
महाराज! जो मनुष्य मांस नहीं खाता, वह भयंकर स्थानों, भयंकर दुर्गों और घने जंगलों में, दिन-रात, चौराहों पर और सभाओं में दूसरों से नहीं डरता। और यदि उस पर शस्त्र भी उठाये जाएँ, अथवा उसे जंगली पशुओं और साँपों का भय भी हो, तो भी वह दूसरों से नहीं डरता। ॥26-27॥
 
King! A person who does not eat meat does not fear others in dangerous places, dreadful forts and dense forests, during the day and night, at cross roads and in public meetings. And even if weapons are raised against him or he is in the fear of wild animals and snakes, he is not afraid of others. ॥26-27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)