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mahabharat 13.120.25: जो लोग स्वाहा (देवयज्ञ) और स्वधा (पितृयज्ञ) का अनुष्ठान करते हैं और यज्ञ के पवित्र अमृत का सेवन करते हैं तथा सत्य और सरलता के प्रेमी हैं, वे देवता हैं, परंतु जो कुटिलता और मिथ्या भाषण में लिप्त रहते हैं और सदैव मांस खाते हैं, उन्हें राक्षस ही समझो ॥25॥   |   mahabharat अध्याय 13.120: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 120: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  13.120.25 
स्वाहास्वधामृतभुजो देवा: सत्यार्जवप्रिया:।
क्रव्यादान् राक्षसान् विद्धि जिह्मानृतपरायणान्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
जो लोग स्वाहा (देवयज्ञ) और स्वधा (पितृयज्ञ) का अनुष्ठान करते हैं और यज्ञ के पवित्र अमृत का सेवन करते हैं तथा सत्य और सरलता के प्रेमी हैं, वे देवता हैं, परंतु जो कुटिलता और मिथ्या भाषण में लिप्त रहते हैं और सदैव मांस खाते हैं, उन्हें राक्षस ही समझो ॥25॥
 
Those who perform the rituals of Swaha (god sacrifice) and Swadha (pitriya yagya) and eat the sacred nectar of Yagya and are lovers of truth and simplicity, they are gods, but those who indulge in crookedness and false speech and always eat flesh, consider them as demons. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)