Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.120.17: मांस का स्वाद चखकर उसका अनुभव कर लेने के बाद उसे त्यागना तथा समस्त प्राणियों की रक्षा करने वाले इस उत्तम अहिंसा व्रत का पालन करना अत्यन्त कठिन हो जाता है ॥17॥ | mahabharat अध्याय 13.120: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
दुष्करं च रसज्ञाने मांसस्य परिवर्जनम्।
चर्तुं व्रतमिदं श्रेष्ठं सर्वप्राण्यभयप्रदम्॥ १७॥
अनुवाद
मांस का स्वाद चखकर उसका अनुभव कर लेने के बाद उसे त्यागना तथा समस्त प्राणियों की रक्षा करने वाले इस उत्तम अहिंसा व्रत का पालन करना अत्यन्त कठिन हो जाता है ॥17॥
After having tasted and experienced the flavour of meat, it becomes extremely difficult to give it up and to follow this best vow of non-violence which gives protection to all creatures. ॥17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥