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mahabharat 13.120.16: हे भारत! जो मनुष्य पहले मांस खाता था और बाद में उसे पूर्णतः त्याग देता है, उसे ऐसे पुण्य की प्राप्ति होती है, जो वेद और यज्ञ भी नहीं दे सकते॥16॥   |   mahabharat अध्याय 13.120: मद्य और मांसके भक्षणमें महान् दोष, उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.120.16 
सर्वे वेदा न तत् कुर्यु: सर्वे यज्ञाश्च भारत।
यो भक्षयित्वा मांसानि पश्चादपि निवर्तते॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे भारत! जो मनुष्य पहले मांस खाता था और बाद में उसे पूर्णतः त्याग देता है, उसे ऐसे पुण्य की प्राप्ति होती है, जो वेद और यज्ञ भी नहीं दे सकते॥16॥
 
O Bharata! The one who used to eat meat and later completely abandons it, gets such merits which even the Vedas and Yajnas cannot give.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)