श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 12: कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान  »  श्लोक d20
 
 
श्लोक  13.12.d20 
अकृत्वा भरणं पित्रोरदत्त्वा गुरुदक्षिणाम्।
कृतघ्नतां च सम्प्राप्य मरणान्ता च निष्कृति:॥
 
 
अनुवाद
अपने माता-पिता का भरण-पोषण न करके और गुरुदक्षिणा न देकर मैं कृतघ्न हो गया हूँ। इस कृतघ्नता का प्रायश्चित यही है कि मैं स्वेच्छा से मृत्यु को स्वीकार कर लूँ।'
 
‘By not supporting my parents and not giving Gurudakshina, I have become ungrateful. The atonement for this ungratefulness is to voluntarily accept death.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)