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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 12: कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान
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श्लोक d2
श्लोक
13.12.d2
ये चाप्यन्ये परे तात कृतघ्ना निरपत्रपा:।
तेषां गतिं महाबाहो श्रोतुमिच्छामि तत्त्वत:॥
अनुवाद
हे पिता! हे महाबाहु! जो निर्लज्ज और कृतघ्न हैं, उनका क्या हश्र होता है? मैं यह सब यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ।
Father! O mighty-armed one! What is the fate of others who are shameless and ungrateful? I wish to hear all this in its true form.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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