श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 12: कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान  »  श्लोक d19
 
 
श्लोक  13.12.d19 
निष्कृतिं नैव पश्यामि कृतघ्नानां कथंचन।
ऋते प्राणपरित्यागं धर्मज्ञानां वचो यथा॥
 
 
अनुवाद
‘मैं कृतघ्नों को बचाने के लिए प्राण त्यागने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं देखता।’ धार्मिक पुरुषों का वचन भी यही है।
 
‘I cannot see any other way to save the ungrateful except by sacrificing one's life. The words of the religious men are also the same.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)