श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 12: कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान  »  श्लोक d17
 
 
श्लोक  13.12.d17 
तिर्यग्योनावपि कथं दृश्यते धर्मवत्सल:।
अतो नु भद्रं महिष: शिलापट्ट इव स्थित:।
पीवरश्चैव शूल्यश्च बहुमांसो भवेदयम्॥
 
 
अनुवाद
अहा! पशु योनि में जन्म लेकर भी यह कितना धर्म-प्रेमी लग रहा है? यह भैंसा तो सचमुच मेरे ऊपर चट्टान की तरह खड़ा रहा। इसीलिए मुझे लाभ हुआ। यह बहुत मोटा और हृष्ट-पुष्ट है।'
 
‘Oh! Despite being born as an animal, how dharma-loving he appears to be? This buffalo definitely stood over me like a rock. That is why I am benefited. He is very fat and very muscular.’
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)