श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 12: कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  13.12.34-35 
पुत्राणां द्वे शते ब्रह्मन् कालेन विनिपातिते।
अहं राजाभवं विप्र तत्र पूर्वं शतं मम॥ ३४॥
समुत्पन्नं स्वरूपाणां पुत्राणां ब्राह्मणोत्तम।
कदाचिन्मृगयां यात उद्‍भ्रान्तो गहने वने॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण! मेरे दो सौ पुत्र काल के ग्रास बन गए । ब्राह्मण! मैं पहले राजा था । उस समय मेरे सौ पुत्र थे । हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! वे सब मेरे ही समान थे । एक दिन मैं आखेट के लिए घने वन में गया और वहाँ भ्रमित होकर इधर-उधर भटकने लगा ॥ 34-35॥
 
‘Brahmin! My two hundred sons were killed by death. Brahmin! I was a king earlier. At that time I had a hundred sons. O best of Brahmins! All of them were like me. One day I went to a deep forest for hunting and there I got confused and started wandering here and there. ॥ 34-35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)