श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 12: कृतघ्नकी गति और प्रायश्चित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  13.12.12-13 
आरोहिष्येकथं त्वश्वं कथं यास्यामि वै पुरम्।
इष्टेनाग्निष्टुता चापि पुत्राणां शतमौरसम्॥ १२॥
जातं महाबलानां मे तान् प्रवक्ष्यामि किं त्वहम्।
दारेषु चात्मकीयेषु पौरजानपदेषु च॥ १३॥
 
 
अनुवाद
स्त्रीरूप धारण करके वह इस प्रकार सोचने लगा - अब मैं घोड़े पर कैसे चढ़ूँगा ? नगर में कैसे जाऊँगा ? अग्निष्टु यज्ञ से मुझे सौ अत्यंत बलवान पुत्र प्राप्त हुए हैं । उनसे क्या कहूँगा ? अपनी पत्नियों तथा नगर और जनपद के लोगों के पास कैसे जाऊँगा ?॥12-13॥
 
In the form of a woman, he started thinking like this - How will I mount the horse now? How will I go to the city? I have got hundred very strong sons by performing the Agnishtu Yajna. What will I tell them? How will I go to my wives and the people of the city and the district?॥12-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)