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mahabharat 13.118.8: जो बात तुम्हें अच्छी न लगे, वह दूसरों के साथ भी न करो। यही धर्म का संक्षिप्त लक्षण है। इससे भिन्न जो भी आचरण है, वह कामनाओं पर आधारित है। ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 13.118: बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा बताकर स्वर्गलोकको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 118: बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा बताकर स्वर्गलोकको प्रस्थान  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  13.118.8 
न तत् परस्य संदध्यात् प्रतिकूलं यदात्मन:।
एष संक्षेपतो धर्म: कामादन्य: प्रवर्तते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
जो बात तुम्हें अच्छी न लगे, वह दूसरों के साथ भी न करो। यही धर्म का संक्षिप्त लक्षण है। इससे भिन्न जो भी आचरण है, वह कामनाओं पर आधारित है। ॥8॥
 
Whatever you do not like, you should not do that to others either. This is the brief characteristic of Dharma. Any behaviour which is different from this is based on desires. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)