श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 118: बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा बताकर स्वर्गलोकको प्रस्थान  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  13.118.7 
सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वभूतानि पश्यत:।
देवाऽपि मार्गे मुह्यन्ति अपदस्य पदैषिण:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जो सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मा है, अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियों की आत्मा को अपनी आत्मा के समान समझता है और जो सम्पूर्ण प्राणियों को समभाव से देखता है, उस आवागमन से रहित बुद्धिमान पुरुष का भाग्य जानने का प्रयत्न करते हुए देवता भी व्याकुल हो जाते हैं। ॥7॥
 
He who is the soul of all beings, i.e. he considers the soul of all beings as his own soul and who looks at all beings with an equal attitude, even the gods get perplexed while trying to find out the fate of that wise person who is free from the comings and goings. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)