श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 118: बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा बताकर स्वर्गलोकको प्रस्थान  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  13.118.6 
आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति पूरुष:।
न्यस्तदण्डो जितक्रोध: स प्रेत्य सुखमेधते॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य सब प्राणियों को अपने समान समझता है, किसी को नहीं मारता (दंड को सदा के लिए त्याग देता है) और क्रोध को वश में रखता है, वह मृत्यु के बाद सुख भोगता है ॥6॥
 
A person who considers all beings as equal to himself, does not beat anyone (gives up punishment forever) and controls his anger, enjoys happiness after death. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)