श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 118: बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा बताकर स्वर्गलोकको प्रस्थान  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  13.118.3-4 
हन्त नि:श्रेयसं जन्तोरहं वक्ष्याम्यनुत्तमम्।
अहिंसापाश्रयं धर्मं य: साधयति वै नर:॥ ३॥
त्रीन् दोषान् सर्वभूतेषु निधाय पुरुष: सदा।
कामक्रोधौ च संयम्य तत: सिद्धिमवाप्नुते॥ ४॥
 
 
अनुवाद
अब मैं मनुष्य के कल्याण के सर्वोत्तम साधन का वर्णन करता हूँ। जो मनुष्य अहिंसा धर्म का पालन करता है, वह अन्य प्राणियों में आसक्ति, मद और मत्सर इन तीन दोषों को स्थापित करके तथा काम और क्रोध को सदैव वश में करके सिद्धि को प्राप्त होता है। ॥3-4॥
 
Now I describe the best means of welfare for man. The man who follows the religion of non-violence, by establishing the three defects of attachment, pride and jealousy in all other creatures and by always controlling lust and anger, attains perfection. ॥ 3-4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)