श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 118: बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा बताकर स्वर्गलोकको प्रस्थान  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  13.118.2 
बृहस्पतिरुवाच
सर्वाण्येतानि धर्म्याणि पृथग्द्वाराणि सर्वश:।
शृणु संकीर्त्यमानानि षडेव भरतर्षभ॥ २॥
 
 
अनुवाद
बृहस्पतिजी बोले- हे भरतश्रेष्ठ! ये छह प्रकार के कर्म ही धर्म के मूल हैं और ये सभी भिन्न-भिन्न कारणों से प्रकट हुए हैं। मैं इन छहों का वर्णन कर रहा हूँ; तुम सुनो।
 
Brihaspatiji said- O best of Bharatas! These six types of deeds are the source of Dharma and all of them have appeared due to different reasons. I am describing these six; you listen.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)