श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 118: बृहस्पतिजीका युधिष्ठिरको अहिंसा एवं धर्मकी महिमा बताकर स्वर्गलोकको प्रस्थान  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  13.118.11 
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा तं सुरगुरुर्धर्मराजं युधिष्ठिरम्।
दिवमाचक्रमे धीमान् पश्यतामेव नस्तदा॥ ११॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिर से ऐसा कहकर परम बुद्धिमान देवगुरु बृहस्पति जी हमारे सामने ही स्वर्ग को चले गये। 11।
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Having said this to Dharmaraja Yudhishthir, the most intelligent Devguru Brihaspati ji went to heaven in front of us. 11॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि संसारचक्रसमाप्तौ त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्रकी समाप्तिविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)