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वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिर से ऐसा कहकर परम बुद्धिमान देवगुरु बृहस्पति जी हमारे सामने ही स्वर्ग को चले गये। 11।
Vaishampayanji says – Janamejaya! Having said this to Dharmaraja Yudhishthir, the most intelligent Devguru Brihaspati ji went to heaven in front of us. 11॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि संसारचक्रसमाप्तौ त्रयोदशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्रकी समाप्तिविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११३॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥