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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन
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श्लोक 98
श्लोक
13.116.98
ततो दु:खमनुप्राप्य बहु वर्षगणानिह।
अपुनर्भवसंयुक्तस्तत: कूर्म: प्रजायते॥ ९८॥
अनुवाद
इन योनियों में अनेक वर्षों तक दुःख भोगने के बाद वह पुनः मनुष्य योनि में नहीं आता, अपितु दीर्घकाल तक कछुआ बन जाता है॥ 98॥
After undergoing pain for many years in these species, he does not come back to human form again and instead becomes a tortoise for a long time.॥ 98॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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