श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 97
 
 
श्लोक  13.116.97 
ततो गर्भशतैर्जन्तुर्बहुभि: सम्प्रपद्यते।
संसारांश्च बहून् गत्वा ततस्तिर्यक्षु जायते॥ ९७॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार जीव सैकड़ों बार गर्भ की यातनाएँ भोगता है और फिर अनेक बार जन्म लेकर तिर्यग्योनियों में जन्म लेता है ॥97॥
 
In this way the living being suffers the tortures of the womb several hundred times. Subsequently, after taking birth many times, he is born in Tiryagyonim. 97॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)