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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन
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श्लोक 96
श्लोक
13.116.96
कृमिर्भवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत।
ततो गर्भं समासाद्य तत्रैव म्रियते शिशु:॥ ९६॥
अनुवाद
भारत! वह पंद्रह वर्ष तक कीड़े के गर्भ में रहता है। फिर गर्भ में आता है और वहीं भ्रूण अवस्था में मर जाता है। 96।
Bharat! He lives in the womb of an insect for fifteen years. Then he comes into the womb and dies there in the state of a foetus. 96.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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