श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 93-94
 
 
श्लोक  13.116.93-94 
दण्डं समुद्‍गरं शूलमग्निकुम्भं च दारुणम्।
असिपत्रवनं घोरवालुकं कूटशाल्मलीम्॥ ९३॥
एताश्चान्याश्च बह्वीश्च यमस्य विषयं गत:।
यातना: प्राप्य तत्रोग्रास्ततो वध्यति भारत॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
भरत! वह भयंकर कुम्भीपाक, असिपत्रवन, तपी हुई बालूका और काँटों से भरी शाल्मली आदि नरकों में दण्ड, गदा और भाले की चोट खाकर कष्ट भोगता है। यमलोक पहुँचकर वह उपर्युक्त तथा अन्य अनेक नरकों की भयंकर यातनाएँ भोगता है और वहाँ यम के दूतों द्वारा मार खाता है।
 
Bhaarat! He suffers the pain of being hit by a stick, a club and a spear in the dreadful fire pit (Kumbhipaak), Asipatravan, the heated sand and the thorny Shalmali, etc. hells. After reaching Yamaloka, he suffers the terrible tortures of the above-mentioned and many other hells and is beaten there by the messengers of Yama.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)