श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  13.116.89 
वृषलो ब्राह्मणीं गत्वा कृमियोनौ प्रजायते।
तत: सम्प्राप्य निधनं जायते सूकर: पुन:॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
शूद्र वर्ण का पुरुष ब्राह्मण वर्ण की स्त्री के साथ सहवास करके मरता है, तो पहले कीड़े की योनि में जन्म लेता है, फिर मरकर सूअर बनता है॥ 89॥
 
A Shudra-caste man, after having intercourse with a Brahmin-caste woman and dying, is first born in the womb of an insect. Then after death he becomes a pig.॥ 89॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)