श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 116: बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  13.116.85 
देवकार्यमकृत्वा तु पितृकार्यमथापि वा।
अनिर्वाप्य समश्नन् वै मृतो जायति वायस:॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य भगवान् के लिए या अपने पितरों के लिए कुछ भी कर्म किए बिना, भगवान् को तर्पण किए बिना ही भोजन करता है, वह मरने के बाद कौवे की योनि में जन्म लेता है ॥85॥
 
One who consumes food without doing any work for God or for his ancestors, without offering sacrifice to God, is born in the womb of a crow after his death. 85॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)